दूर क्षितिज के पार
जमीं से आगे, आसमां से दूर
बादल के धुंध को चीरकर
चाँद-तारों की बस्ती के उस पार
उड़ाता कदमों से गुबार
खुद अपनी ही तलाश में
चला जा रहा हूँ-
अकेला मैं ।
छूटे हुओं को छोड़
टूटे हुओं को जोड़
भूले से, खोये से
जागे, कुछ सोये से
कुछ घायल, कुछ पागल
आधे-अधूरे
फूटे- कुछ पूरे
जले हुये - मरे हुये
आँसुओं से भींगे कुछ भारी से
और
कुछ हँसी में उड़ जाते जो ऐसे कुछ हल्के
अबके
कुछ कल के
कितने अहसासों को
धड़कनों को सांसों को
गले से लगाये
अपनी ही तलाश में
चला जा रहा हूँ - अकेला मै। ।
सुनकर दिशाओं के अट्टाहास
पैर जरा ठिठके
फड़फड़ाते पंखों की भीड़ में
चीख रहे पंक्षियों के रक्त भरे चोंच खुले
सहम-सी गई सांसें
सुनकर चीत्कार कुछ अपने ही अन्दर की
अनगिनत साँपों ने जैसे लपेटा हो
चीथड़े कर रहे हों
वस्त्र मेरे नोंचकर
लाल-लाल था सब कुछ
अगन लाल, गगन लाल
यह कैसा देश है ?
कैसी दुनिया है यह ?
किसने बनाया है ?
कैसे बसाया है ?
डरा-डरा, थका-थका
असहाय-निरुपाय
ढ़ीला पड़ गया देह
सिकुड़ गया,
ढुलमुल-सा शक्तिहीन
जैसे कि अण्डे में बन्द कोई पंछी
शिशु कोई गर्भ में अकेला-
शिथिल पड़ा
हाथों को समेटे
हथेलियों की चंद लकीरें
मुट्ठी में बंद किये
प्रसव की घड़ी का इंतजार करता
अगले जनम तक
अगले क्षितिज तक
नये एहसासों के लिये
फिर से .....
अपनी ही तलाश में......
अकेला मैं ।
जमीं से आगे, आसमां से दूर
बादल के धुंध को चीरकर
चाँद-तारों की बस्ती के उस पार
उड़ाता कदमों से गुबार
खुद अपनी ही तलाश में
चला जा रहा हूँ-
अकेला मैं ।
छूटे हुओं को छोड़
टूटे हुओं को जोड़
भूले से, खोये से
जागे, कुछ सोये से
कुछ घायल, कुछ पागल
आधे-अधूरे
फूटे- कुछ पूरे
जले हुये - मरे हुये
आँसुओं से भींगे कुछ भारी से
और
कुछ हँसी में उड़ जाते जो ऐसे कुछ हल्के
अबके
कुछ कल के
कितने अहसासों को
धड़कनों को सांसों को
गले से लगाये
अपनी ही तलाश में
चला जा रहा हूँ - अकेला मै। ।
सुनकर दिशाओं के अट्टाहास
पैर जरा ठिठके
फड़फड़ाते पंखों की भीड़ में
चीख रहे पंक्षियों के रक्त भरे चोंच खुले
सहम-सी गई सांसें
सुनकर चीत्कार कुछ अपने ही अन्दर की
अनगिनत साँपों ने जैसे लपेटा हो
चीथड़े कर रहे हों
वस्त्र मेरे नोंचकर
लाल-लाल था सब कुछ
अगन लाल, गगन लाल
यह कैसा देश है ?
कैसी दुनिया है यह ?
किसने बनाया है ?
कैसे बसाया है ?
डरा-डरा, थका-थका
असहाय-निरुपाय
ढ़ीला पड़ गया देह
सिकुड़ गया,
ढुलमुल-सा शक्तिहीन
जैसे कि अण्डे में बन्द कोई पंछी
शिशु कोई गर्भ में अकेला-
शिथिल पड़ा
हाथों को समेटे
हथेलियों की चंद लकीरें
मुट्ठी में बंद किये
प्रसव की घड़ी का इंतजार करता
अगले जनम तक
अगले क्षितिज तक
नये एहसासों के लिये
फिर से .....
अपनी ही तलाश में......
अकेला मैं ।
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